
बाहर आसमान किसी पुराने ज़ख़्म की तरह फट पड़ा था। बादलों की भीषण गड़गड़ाहट से पूरा शहर दहल रहा था और खिड़की के काँच पर बारिश की मोटी बूँदें गोलियों की मानिंद बरस रही थीं। पूरा बंगला एक अजीब और दमघोंटू सन्नाटे में डूबा हुआ था।
अनन्या शीशे के सामने खड़ी अपनी हथेलियाँ ठंडे काँच पर टिकाए हुए थी। उसकी अठारह साल की मासूमियत भरी ज़िंदगी ने कभी ऐसे तूफ़ान का सामना नहीं किया था। उसका हाथ काँप रहा था और मोबाइल की स्क्रीन पर सारा का आख़िरी संदेश अब भी चमक रहा था—'मौसम बहुत खराब है, तू आज रात वहीं रुक जा।'




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